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Fish swimming from right to left आर्यान : एक अलोकिक योद्धा एक ऐसे योद्धा की कहानी जिसके आगे इंसान तो क्या देवता भी झुक गये. जुड़िये हमारे साथ इस रोमांचित कर देने वाले सफ़र पर .... कहानी प्रारंभ - बदले की भावना शीर्षक से

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Tuesday, 5 May 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 6

पेज- 17 
( अंतिम भाग )

“ उनके लिए मै आतंकवादी के उपनिवेश बनाऊगा “ रावण ने योजना बताई

“ आतंकवादी ? ? ? ये क्या है ?” शुक्राचार्य ने आश्चर्य से पूछा

गुरुदेव आतंकबादी वो आताताई होगे जो जगह जगह उपनिवेश बना कर उस राज्य में उत्पात मचाएगे ताकि वहा की शांति भंग हो जाये उस राज्य की शांति भंग कर राज्य को कमजोर करेगे , प्रजा को भयभीत करेगे इतना भयभीत करेगे की प्रजा राजा का विरोध करे और राजा का मनोबल कमजोर हो जाये ,कमजोर मनाबल का राजा चाहे कितना ही पराक्रमी ही क्यों न हो आसानी से पराजित किया जा सकता है “ रावण ने कहा

“ परंतू रावण कोई भी राजा अपने राज्य में यैसे आतंकबादी उपनिवेश क्यों बनाने देगा ?” शुक्राचार्य ने पूछा

“ गुरुदेव राजा उपनिवेश नहीं बनाने देगे वो तो राज्य की स्वार्थी और लालची प्रजा बनवाएगी एक बार उपनिवेश बन जाये फिर वही स्वार्थी प्रजा आतंकबादीओ से डरेगी भी परंतू अपनी गलती ना मान कर सारा दोष राजा को देगी तभी तो राजा कमजोर होगा “ रावण ने बताया
शुक्राचार्य मुस्कुराने लगे उन्हें एक बार लगा रावण का मनोविज्ञान उच्च कोटि का है उन्होंने रावण से फिर पूछा “ रावण इन आतंकबादी उपनिवेश से काम क्या करवाओगे ?”

“ गुरुदेव इन आतंकबादी संगठनो का कार्य प्रजा को भयभीत करना अपनी जाति का विस्तार करना होगा जिसके लिए ये प्रजा के आस्था के केंद्र जैसे ऋषि मुनि के आश्रम में आघात करेगे , जनता को भय और लालच से राक्षस बनायेगे , उनकी कन्याओ को प्रेम जाल में फसा कर, या भय से लालच से कैसे भी विवाह कर नए राक्षस पैदा करेगे , इन्हें संरक्षण और आवश्यक जनबल धनबल मै दूगा “ रावण ने कहा

“ तो क्या इतना सब करने में इन्हें राज्य के राजा का भय नहीं होगा ?” शुक्राचार्य ने पूछा

“ नहीं गुरुदेव जब स्थानीय प्रजा का साथ मिलेगा तो इन्हें किसी का भी भय नहीं होगा “ रावण ने कहा

“ रावण इस प्रकार से तुम तो प्रजा के शरीर पर ही नहीं उसके मस्तिष्क पर भी रक्ष संस्कृति को भर दोगे” शुक्राचार्य मुस्कुराने लगे

Sunday, 3 May 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 5

पेज-17
( अगला भाग )

“क्षमाँ करे गुरुदेव मै सर्वप्रिय शंकर का सहयोग लूगा समर्थन भी लूगा परंतू उनके दास बन कर नहीं बिपत्ती आने पर हम सब राक्षस जाती के लोग स्वयं ही संघर्ष करेगे किसी के भी आगे हाथ जोड़ कर खड़े नहीं होगे “ रावण ने गौरव के साथ कहा उसका आत्म विश्वास उसके चहरे से झलक रहा था

शुक्राचार्य मुस्कुरा दिए

“ रक्ष संस्कृति तो वही है जो दैत्य संस्कृति है हम सब जीवन को सुख पूर्वक जियेगे पूर्ण आनंद लेगे जीवन का सम्पूर्ण भोग पर हमारा अधिकार होगा बिना किसी बंधन ढकोसला या मर्यादा के दिखावे में नहीं पड़ेगे जीवन का आनंद लेगे “ रावण ने अपनी बात पूरी की

“ लगता है उपवीत से बहुत प्रगाढ़ मित्रता हो गई है रावण पूरा चर्वाक का दर्शन तुम्हे याद हो गया है “ शुक्राचार्य हसते हुए बोले

“जी गुरुदेव आचार्य उपवीत मेरे परम मित्र और मार्गदर्शक है “ रावण ने कहा

“ रावण इस प्रकार से तो यह रक्ष संस्कृति मात्र एक छोटे से भूभाग में ही सिमट कर रह जाएगी “ शुक्राचार्य ने संदेह प्रगट किया

“ नहीं गुरुदेव मेरी योजना के अनुसार मै इसका विस्तार सम्पूर्ण भूमंडल में करुगा “ रावण ने कहा

“ वो कैसे ? क्या है तुम्हारी योजना ?” शुक्राचार्य ने आश्चर्य से पूछा

Friday, 1 May 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 4

पेज- 17
( भाग - १ )

“ प्रणाम आचार्यवर !” सब एक साथ बोले

“ दीर्घायू हो “ शुक्राचार्य ने आशीर्वाद दिया

सुमाली ,माली, माल्यवंत, कैकसी सहित रावण शुक्राचार्य आश्रम में  आये हुए थे सभी के सर सम्मान में झुके हुए थे.

“ गुरुदेव मै दैत्य सेनापति नाना सुमाली का पौत्र एवं माता कैकसी का ज्येष्ट्र पुत्र रावण हूँ मै आपके श्री चरणों में प्रणाम करता हूँ “ रावण ने आगे बढ़ कर कहा

“ माता कैकसी का पुत्र ! अपने पिता विश्रवा का पुत्र रावण नहीं ?” शुक्राचार्य ने हस कर पूछा

“ नही ! क्यों की रावण उन सिध्दान्तो से सहमत नहीं जिनका उसके पिता अनुशरण करते है “ रावण ने कहा

“ हूँ तुम्हारे वारे में बहुत कुछ सुना है रावण अब तो मेरी भी हार्दिक इच्छा है की तुम्हे पूर्ण ज्ञान दे कर तुम्हे इतना योग्य बनाऊ की तुम अपनी अपने उद्देश्य में सफल हो कर जाती का गौरव बनो “ शुक्राचार्य ने कहा

“ अर्थात आप मुझे बिना किसी भेद भाव के शिक्षा देगे “ रावण ने उत्सुक हो कर पूछा

Sunday, 12 April 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 3


Page - 16

सूर्पनखा की आयु अभी कम ही थी चंचल, सुन्दर, मोहक छवि की लड़की जिसमे बाल सुलभ सारा अल्हड पन भी था. सूर्पनखा पैदा होने के बाद से हमेशा प्राकृतिक बातावरण में पली बढ़ी  थी इसलिए उसे प्रकृति से लगाब ज्यादा ही था जिस गुफा कन्दरा के पास सुमाली सहित सभी दैत्य छिप कर रहते थे वही समीप में एक प्राकृतिक झील थी जहाँ चारो ओर हरियाली लिए सुन्दर पेड़, फूलो से लदे, विहंगम द्रश्य बनाते थे मानो नीली झील के चारो ओर हरा रंग उसके ऊपर पीले और लाल रंग के फूलो का गुच्छा , प्रकृति ने खुद ही चित्रकारी की हो. सुबह सूर्योदय के समय जब सूर्य के लालिमा लिए प्रकाश की किरणे झील के स्वच्छ नीले पानी पर पड़ती थी और झील का लहराता पानी ऐसे लगता था मानो सूर्य खुद झील की गोद में डूब कर तैर रहा हो लगभग यही अनुपम द्रश्य की सुन्दरता शाम को भी होती थी. झील में डूबते हुए सूर्य को शाम के समय देखना सूर्पनखा को बहुत प्रिय था बह नित्य सायःकाल झील पर यही द्रश्य देखने अवश्य जाती थी.

 एक दिन शाम के समय सूर्पनखा तेजी से भागी हुई झील की ओर जा रही थी माँ केकषी ने देखा तो टोका

“ सूर्पनखा ! इतनी तेज कहा भागी जा रही हो ? “

“ बस अभी आई माता श्री “ बिना रुके ही सूर्पनखा ने उत्तर दिया

“मै जानती हूँ तुम रोज शाम को झील पर जाती हो देखो वह जंगल है जहा हिंसक पशु भी होते है अगर कोई हिंसक जानवर आ जाए तो तेरे पास कोई अस्त्र शस्त्र भी नहीं है क्या करेगी “ केकषी ने चिल्ला कर  पूछा

सूर्पनखा रुकी अपने नाख़ून केकषी को दिखा कर बोली “ माँ मेरे नाख़ून देखे है मेरा नाम सूर्पनखा यूं ही नहीं है ये नाख़ून ही मेरे अश्त्र शस्त्र सभी कुछ है आप बिलकुल चिंता ना करे ..... मै जाती हूँ देर हो रही है “ कह कर सूर्पनखा भाग गई

Monday, 6 April 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 2

Page - 15

भोजन करने के बाद उपवीत और रावन दोनों एक एकांत सी जगह पर रुक गए भीड़ से दूर शांति में रावन ने उपवीत से पूछा “ मित्र ये कलीकेय मेरे साथ इस तरह का व्यबहार क्यों कर रहे है ?”

“ क्यों की तुम एक आर्य पुत्र हो और कलिकेय आर्य पर विश्वास नहीं कर सकते “ उपवीत ने कहा

“ तब तो यैसे कई होगे जो मुझ पर विश्वास नही करेगे ?” रावन ने पूछा

“नहीं यदि शुक्राचार्य आप पर विश्वास कर ले और आपको शिक्षा दे तो शायद सभी आप पर विश्वास करके आपका समर्थन करेगे “ उपवीत ने बताया

“कलिकेय भी ?” रावन ने फिर पूछा

“ हा शायद कलिकेय भी “ उपवीत ने कहा

“ जाऊगा शुक्राचार्य के पास, फिर देखता हूँ वो मुझे शिक्षा योग्य मानते है या नही ? या फिर वो भी तात अगस्त की तरह ही मुझे .............” रावन कुछ कहना चाह रहा था की उपवीत हँसने लगा और बोला “ आपकी तो समस्या ही अजीव है दैत्य आपको आर्य पुत्र मान कर विश्वास नही करते आर्य आपको दैत्य मान कर विश्वास नही करते इधर माँ उधर पिता “

Saturday, 28 March 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो

                                                                                Page - 14

“अब तुम ही सोच रहे हो तो बताओ इस अन्याय से कौन करेगा हमारी रक्षा ?“ अब कैकसी ने पूछा

रावन अभी भी अपनी ही सोंच में डूबा हुआ था उसने आर्यों की सोंच भी याद की जो अगस्त आश्रम में उसने दैत्यों के प्रति देखी थी जब केवल उसकी माँ के दैत्य होने के कारन ही पूर्ण शिक्षा से वंचित किया गया था . देव और आर्य दोनों ही जातिया दैत्य जाति को तिरस्कृत रूप में देखते है तभी तो दैत्यों को आर्यावृत से दूर यहाँ सदूर दक्षिण में दंडकारन्य के घने जंगल में समुद्र के पास छोड़ रखा है. रावन को लगा यदि रावन ने इनको भय मुक्त किया तो रावन अपने पराक्रम से देव अधिपति इंद्र की तरह ही अपना साम्राज्य बना सकता है क्यों की दैत्यों में अभी भी कई योग्य योद्धा है जो केवल उचित नेतृत्व के आभाव में दिशाहीन बैठे है यहाँ बल तो है बुध्दी नहीं है. यदि मै इनको न्याय दिला सका इनको समाज में स्थान दिलवा सका तो पूरे भूमंडल पर मेरा राज्य हो सकता है इन दैत्यों को चाहिए क्या ..... न्याय ..... उसके लिए मेरा नेतृत्व ........और रक्षा

रावन को उपवीत की बाते याद आ रही थी उपबीत ने रावन से कहा था “ हाथ में आया अवसर मत छोडो “ रावन ने याद  किया ओर बोल पड़ा “वयं रक्षामः“

सभी रावन की  ओर उम्मीद भरी नजर से देखने लगे.

वयं रक्षामः” रावन पुनः बोला सभी रावन की ओर बराबर देख रहे थे.

“अर्थात हम अपनी रक्षा स्यम  करेगे हम ना ही देवताओं से समर्थन मागेगे ना ही उनसे रक्षा करवायेगे हमारा अपना ही एक समुदाय होगा जहा हम सब एक दूसरे की रक्षा करेगे ओर वह जो रक्षा करेगा वह होगा रक्षः सः “ रावन ने अपनी बात पूरी की

“ राक्षसः? “ एक दैत्य ने प्रश्न बाचक रूप में पूछा 

Tuesday, 24 March 2015

निर्धारित लक्ष्य :निश्चित सफलता – 9

Page - 13

यदि तुम दुनिया को अपने सिद्धांतो पर नही चलाते तो दुनिया तुम्हे अपने नियम से चलाएगी“
“ जो भी अवसर मिले उसका लाभ उठाईये “

उपवीत के कहे शब्द रावन के दिमाग में गूज रहे थे. सोचते सोचते रावन उत्सव स्थल पर आ गया.
“वत्स रावन कहा चले गए थे ? आओ मै तुम्हारा सबसे परिचय करवा दू“ सुमाली ने रावन को देखते ही कहा

रावन सुमाली के साथ साथ चल दिया सुमाली के इशारे पर संगीत ओर नृत्य रुक गया, अब सुमाली ने पूरी सभा से बोलना शुरू किया “मेरे दैत्य बंधुओ ओर दैत्य समर्थक बंधुओ ये है मेरी अति बिदुशी पुत्री कैकसी का परम योद्धा जेष्ठ पुत्र रावन, यह हमारे दुखो का अंत करेगा, यह हमारे परम शत्रु देव अधिपति इंद्र को उसकी दुष्टता का दंड देगा “

“ सेनापति सुमाली तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो की रावन देवताओ को दंड देगा ?“ एक बूढे कालिकेय ने पूछा

“ बुजुर्ग कलिकेय ! मै तुम्हारे प्रश्न की प्रसंसा करता हूँ परन्तु मै इसलिए ऐसा कह रहा हूँ क्यों की मै जानता  हूँ की रावन बलशाली है बुद्धिमान है कल ही इसकी बुधि ओर बल का परीक्षण हो चुका है इसने दस धनुष धारीयो को निहत्धे पराजित  किया था “ सुमाली ने कहा

“ रावन की बुधि की प्रसंसा तो मैंने अगस्त आश्रम में भी सुनी थी जहा मेरा एक मित्र रूप बदल कर रहता है “ एक अन्य दैत्य ने कहा

Sunday, 15 March 2015

निर्धारित लक्ष्य :निश्चित सफलता – 8

Page - 12

रावन के आने की खुशी में सुमाली के साथ कैकसी, सूर्पनखा, माल्यबंत, माली सहित दैत्य जाति के दानव जाति के असुर कालिकेय सहित सभी दैत्य समर्थक जाति के प्रमुख योद्धा उत्सव मना रहे थे. सभी को लग रहा था अब अस्तित्व की तलाश में घुमती हमारी जाति का उद्धारक आ गया है और रावन उनकी जाति का अस्तित्व पुनः स्थापित करेगा. सुमाली चाहता था इस प्रकार आयोजन के से रावन का सभी से परिचय हो जाये. सब के अन्दर पुनः नई उर्जा पैदा हो जाये नई आशा, नया जोश पूरी जाति में पैदा हो. बिना जोश के तो कुछ भी संभव नहीं है.

रावन इन बातो से अनभिज्ञ था उसे मात्र ये लग रहा था की वह अपने नाना, मामा आदि से मिल रहा है. उत्सव का प्रयोजन उसके लिए महज ओपचारिक ही लग रहा था.

कैकसी के ओजस्वी पुत्र के प्रथम आगमन के अवसर में हो रहे उत्सव में मांस मदिरा आदि दैत्यों के लिए रुचिकर भोजन की पूरी ब्यबस्था थी. रावन के लिए ये सब नया और अरुचिकर था . उत्सव में दैत्य कन्याओ का नृत्य एवं संगीत चल रहा था, रावन ने नृत्य सीखा अवश्य था परन्तु यह नृत्य शैली रावन के लिए अनोखी थी, नृत्य की भव भंगिमाये रावन को अच्छी नहीं लग रही  थी ,उसे ये उत्तेजना से परिपूर्ण लग रही थी.

रावण ये सब छोड़ कर एकांत में जाना चाह रहा था. रावन एकांत की चाह में चारो ओर देख रहा था, सहसा उसकी नजर उस गुफा कन्दरा के अन्दर ही एक ऊपर से गिरती जलधार पर पड़ी. प्राक्रतिक विहंगम द्रश्य ! रावन खुश हो गया रावन धीरे से उस ओर चल दिया. जल का प्रवाह एक छोटे से कुण्ड पर ख़त्म होता था रावण कुण्ड के समीप जाने लगा. कुण्ड में दूर से ही स्वच्छ जल स्पष्ट दिख रहा था. सहसा रावन रुका, रावन ने देखा एक नव वयस्क दैत्य कन्या कुण्ड के जल में बीच में खडी कुछ ढूढ़ रही है, रावन को याद आया यही सुंदरी तो अभी कुछ देर पहले नृत्य कर रही थी . दैत्य सुंदरी का शरीर पूरा अनुपातिक गढ़ा हुआ अत्यंत सुन्दर, गोरा, मिश्रित गुलाबी रंग गीले कपड़ो में उभरता शरीर, स्पष्ट दिख रहा था सुंदरी बार बार पानी में डूबती फिर उठती, सिर से गिरती पानी की बुँदे हल्की रोशनी में भी उसके गुलाबी शरीर में मोती की तरह चमक रहे थे. यह ढूढ़ क्या रही है ? रावन सोचने लगा. रावन से अनजान सुंदरी आधे से ज्यादा उघरे शरीर से अनजान अपने कार्य में लगी हुई थी.

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