बदले की भावना : विनाश को जन्म देती है
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विश्रवा आश्रम में ,
“ त्राहिमाम शरनागतम !
त्राहिमाम शरनागतम !
स्त्री स्वर सुनकर ध्यानरत
विश्रवा ने आँखे खोली सामने एक सुन्दर स्त्री को देख कर चौक उढे “कौन? “
उनके मुंह से निकला “ इस आश्रम में इतनी ब्याकुल , अपने आने का प्रयोजन बताओ ? “
विश्रवा ने पूछा
“ देव आपसे क्या छिपा है ? आप सब जानते है फिर भी पूछ रहे है तो बताती हूँ
मै आपकी शरणागत हूँ आशय दीजिये देव “ केकषी ने कहा
“इस आश्रम में तुम्हे किसका भय है ?
किस बात का आश्रय चाहिए स्पष्ट कहो ? “ विश्रवा ने पूछा
“आपके आधीन मुझे कोई भय नहीं है देव मै तो मात्र आपके शरणागत हो कर आपकी
सेवा का अवषर चाहती हूँ “ केकषी ने दींन बनते हुए कहा