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Fish swimming from right to left आर्यान : एक अलोकिक योद्धा एक ऐसे योद्धा की कहानी जिसके आगे इंसान तो क्या देवता भी झुक गये. जुड़िये हमारे साथ इस रोमांचित कर देने वाले सफ़र पर .... कहानी प्रारंभ - बदले की भावना शीर्षक से

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Friday, 15 May 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 7

पेज - 18

शुक्राचार्य के कहने पर कुम्भकर्ण और बिभीषण को अगस्त आश्रम से वापस बुला लिया गया था I अब तीनो भाई शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे I शुक्राचार्य रावण की योग्यता से बहुत अधिक प्रभाबित थे, यद्यपि शुक्राचार्य जानते थे की रावण एक नई रक्ष संस्कृति का प्रणेता है फिर भी उन्हें रावण में ही दैत्यों का भविष्य दिखाई दे रहा था I रावण भी पूरी निष्ठा और लगन से शिक्षा प्राप्त कर रहा था I खाली समय में रावण अपने परम मित्र उपवीत से बाते करना पसंद करता था I

एक दिन शाम के समय रावण और उपवीत आश्रम के पास ही जंगल में घूम रहे थे I घूमते-घूमते रावण ने उपवीत से पूछा “मित्र जो हम सोचते है या जो हम चाहते है, वह हमेशा सच क्यों नहीं होता? जब की मनोविज्ञान के आचार्यो का कहना है कि आप प्रबलता के साथ इच्छाये रखिये सदैव पूर्ण होगी“
“युवराज रावण ! इस ब्रम्हांड में फैली अनन्त उर्जा आपको वह देने को तैयार है जो आप लेना चाहते है, बस निर्भर करता है आपकी इच्छा की प्रबलता और आपकी क्रियाशीलता पर आप जो कुछ भी चाहते है उसके लिए पूर्ण प्रयत्न भी करे“ उपवीत ने समझाया I

“कई बार इस सब के बाबजूद मन के अनुसार प्राप्त नहीं होता क्यों?” रावण ने फिर पूछा I

“मित्र रावण ! हम यही सोचते है की हमें पता है हमारे लिए क्या अच्छा है परंतु ब्रम्हांड में हर और फैली उर्जा हमसे ज्यादा जानती और हमें वह देती है जो वास्तव में हमारे लिए अच्छा होता है“ उपवीत ने बताया I

“वो कैसे?” रावण ने पूछा I

“रावण याद करो, ऋषि अगस्त से शिक्षा प्राप्त करने गए थे, उन्होंने मना कर दिया तुम्हे बुरा लगा परंतु यदि तुमने अगस्त के यहाँ पूर्ण शिक्षा प्राप्त की होती तो क्या तुम यहा शिक्षा लेने आते? क्या तुम्हे शुक्राचार्य शिक्षा देते? क्या तुम पूर्ण भोग विलास से भरे जीवन के बारे में सोचते? क्या तुम राक्षस जाति के प्रणेता बनाते? नहीं मित्र रावण ये सब कुछ कभी नहीं होता ब्रम्हांड की उर्जा ने तुम्हे वही दिया जो तुम्हारे लिए उचित था“ उपवीत ने समझाया I

“हूँ“ रावण सोचने लगा फिर बोला “तो मै यह मानू की कई बार मनचाही वस्तु का ना मिलना भी उचित हो सकता है“

Sunday, 12 April 2015

अवसर मिले ; पकड़ लो - 3


Page - 16

सूर्पनखा की आयु अभी कम ही थी चंचल, सुन्दर, मोहक छवि की लड़की जिसमे बाल सुलभ सारा अल्हड पन भी था. सूर्पनखा पैदा होने के बाद से हमेशा प्राकृतिक बातावरण में पली बढ़ी  थी इसलिए उसे प्रकृति से लगाब ज्यादा ही था जिस गुफा कन्दरा के पास सुमाली सहित सभी दैत्य छिप कर रहते थे वही समीप में एक प्राकृतिक झील थी जहाँ चारो ओर हरियाली लिए सुन्दर पेड़, फूलो से लदे, विहंगम द्रश्य बनाते थे मानो नीली झील के चारो ओर हरा रंग उसके ऊपर पीले और लाल रंग के फूलो का गुच्छा , प्रकृति ने खुद ही चित्रकारी की हो. सुबह सूर्योदय के समय जब सूर्य के लालिमा लिए प्रकाश की किरणे झील के स्वच्छ नीले पानी पर पड़ती थी और झील का लहराता पानी ऐसे लगता था मानो सूर्य खुद झील की गोद में डूब कर तैर रहा हो लगभग यही अनुपम द्रश्य की सुन्दरता शाम को भी होती थी. झील में डूबते हुए सूर्य को शाम के समय देखना सूर्पनखा को बहुत प्रिय था बह नित्य सायःकाल झील पर यही द्रश्य देखने अवश्य जाती थी.

 एक दिन शाम के समय सूर्पनखा तेजी से भागी हुई झील की ओर जा रही थी माँ केकषी ने देखा तो टोका

“ सूर्पनखा ! इतनी तेज कहा भागी जा रही हो ? “

“ बस अभी आई माता श्री “ बिना रुके ही सूर्पनखा ने उत्तर दिया

“मै जानती हूँ तुम रोज शाम को झील पर जाती हो देखो वह जंगल है जहा हिंसक पशु भी होते है अगर कोई हिंसक जानवर आ जाए तो तेरे पास कोई अस्त्र शस्त्र भी नहीं है क्या करेगी “ केकषी ने चिल्ला कर  पूछा

सूर्पनखा रुकी अपने नाख़ून केकषी को दिखा कर बोली “ माँ मेरे नाख़ून देखे है मेरा नाम सूर्पनखा यूं ही नहीं है ये नाख़ून ही मेरे अश्त्र शस्त्र सभी कुछ है आप बिलकुल चिंता ना करे ..... मै जाती हूँ देर हो रही है “ कह कर सूर्पनखा भाग गई

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