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( अगला भाग )
“क्षमाँ करे गुरुदेव मै सर्वप्रिय शंकर का
सहयोग लूगा समर्थन भी लूगा परंतू उनके दास बन कर नहीं बिपत्ती आने पर हम सब राक्षस
जाती के लोग स्वयं ही संघर्ष करेगे किसी के भी आगे हाथ जोड़ कर खड़े नहीं होगे “
रावण ने गौरव के साथ कहा उसका आत्म विश्वास उसके चहरे से झलक रहा था
शुक्राचार्य मुस्कुरा दिए
“ रक्ष संस्कृति तो वही है जो दैत्य संस्कृति
है हम सब जीवन को सुख पूर्वक जियेगे पूर्ण आनंद लेगे जीवन का सम्पूर्ण भोग पर
हमारा अधिकार होगा बिना किसी बंधन ढकोसला या मर्यादा के दिखावे में नहीं पड़ेगे
जीवन का आनंद लेगे “ रावण ने अपनी बात पूरी की
“ लगता है उपवीत से बहुत प्रगाढ़ मित्रता हो
गई है रावण पूरा चर्वाक का दर्शन तुम्हे याद हो गया है “ शुक्राचार्य हसते हुए
बोले
“जी गुरुदेव आचार्य उपवीत मेरे परम मित्र और
मार्गदर्शक है “ रावण ने कहा
“ रावण इस प्रकार से तो यह रक्ष संस्कृति
मात्र एक छोटे से भूभाग में ही सिमट कर रह जाएगी “ शुक्राचार्य ने संदेह प्रगट
किया
“ नहीं गुरुदेव मेरी योजना के अनुसार मै इसका
विस्तार सम्पूर्ण भूमंडल में करुगा “ रावण ने कहा
“ वो कैसे ? क्या है तुम्हारी योजना ?”
शुक्राचार्य ने आश्चर्य से पूछा