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भोजन करने के बाद उपवीत और रावन दोनों एक
एकांत सी जगह पर रुक गए भीड़ से दूर शांति में रावन ने उपवीत से पूछा “ मित्र ये
कलीकेय मेरे साथ इस तरह का व्यबहार क्यों कर रहे है ?”
“ क्यों की तुम एक आर्य पुत्र हो और कलिकेय
आर्य पर विश्वास नहीं कर सकते “ उपवीत ने कहा
“ तब तो यैसे कई होगे जो मुझ पर विश्वास नही
करेगे ?” रावन ने पूछा
“नहीं यदि शुक्राचार्य आप पर विश्वास कर ले
और आपको शिक्षा दे तो शायद सभी आप पर विश्वास करके आपका समर्थन करेगे “ उपवीत ने
बताया
“कलिकेय भी ?” रावन ने फिर पूछा
“ हा शायद कलिकेय भी “ उपवीत ने कहा
“ जाऊगा शुक्राचार्य के पास, फिर देखता हूँ
वो मुझे शिक्षा योग्य मानते है या नही ? या फिर वो भी तात अगस्त की तरह ही मुझे
.............” रावन कुछ कहना चाह रहा था की उपवीत हँसने लगा और बोला “ आपकी तो
समस्या ही अजीव है दैत्य आपको आर्य पुत्र मान कर विश्वास नही करते आर्य आपको दैत्य
मान कर विश्वास नही करते इधर माँ उधर पिता “
